Sunday, September 25, 2011

कर्म क्या है, अकर्म क्या है? विकर्म क्या है? - प्रो. बसन्त


                      कर्म  अकर्म  विकर्म 

कर्म अकर्म का निर्णय करने में बड़े बड़े बु़द्धिमान पुरुष भी भ्रम में पड़ जाते हैं फिर साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है।  कर्म की गति अत्याधिक सूक्ष्म है और उसे समझना बहुत कठिन है।
सभी कर्मों के होने के लिए  पांच कारण सांख्य शास्त्र में बताये हैं. अधिष्ठान ही जीव की देह है। इस देह में जीव (भोक्ता) इस देह को भोगता है अतः दूसरा तत्व जीव कर्ता है। प्रकृति में आत्मा का प्रतिबिम्ब जीव है, आत्मा का देह भाव जीव है। जीव देह में कर्ता, भोक्ता रूप में रहता है। तीसरा तत्व है करण अर्थात भिन्न भिन्न इन्द्रियों का होना और चौथा है चेष्टा जिससे अंग संचालित हों। ज्ञान जब जीभ से से बाहर आता है तो वाणी, नेत्र से बाहर आता है तो दृश्य, पांव से चलना फिरना आदि अर्थात नाना प्रकार की चेष्टाएं। पांचवां दैव अर्थात परिस्थिति अनुकूल है, इन्द्रियां अनुकूल हैं, चित्त भी अनुकूल हो। सभी तत्व अनुकूल हों, यह प्रारब्ध वश होता है। इन हेतुओं से कर्म की रचना होती है।
कोई भी मनुष्य किसी भी क्षण बिना कर्म के नहीं रह सकता सभी प्राणी प्रकृति बाध्य हैं। सांस लेना सांस छोड़ना, सुनना देखना, चलना फिरना, उठना बैठना, शौच आदि सभी स्वाभाविक रुप से होने वाले कर्म हैं । कोई भी मनुष्य या प्राणी स्वाभाविक कर्मों का त्याग नहीं कर सकता है।
सुस्पष्ट है कर्म रहित होना असम्भव है शरीर संचालन भी बिना कर्म के नहीं हो सकता है।
दूसरे के धर्म से गुण रहित अपना धर्म (स्वभाव) अति उत्तम है। दूसरे का धर्म (स्वभाव) यद्यपि श्रेष्ठ हो या दूसरे के धर्म (स्वभाव) को भली प्रकार अपना भी लिया जाय तो भी उस पर चलना अपनी सरलता को खो देना है क्योंकि हठ पूर्वक ही दूसरे के स्वभाव का आचरण हो सकता है, अतः स्वाभाविकता नहीं रहती। अपने धर्म (स्वभाव) में मरना भी कल्याण कारक है दूसरे का स्वभाव भय देने वाला है अर्थात तुम्हारे अन्दर सत्त्व, रज, तम की मात्रा के अनुसार तुम्हारा जो स्वाभाविक स्वभाव है उसका सरलता पूर्वक निर्वहन करना कल्याण कारक है. व्यक्ति स्वाभाविक कर्म करता हुआ सरल होता जाता है, उसे अशान्ति नहीं होती है।
सभी कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा किये जाते हैं अर्थात सत्त्व, रज और तम की विभिन्न मात्रा के अनुसार प्रत्येक प्राणी अलग अलग स्वाभाविक कर्म करता है परन्तु अहंकार के कारण मनुष्य (अज्ञानी जीवात्मा) स्वयं को कर्ता मानता है और कर्म बन्धन में फॅसता है।

कर्म  अकर्म और विकर्म
कर्म क्या है?
ईश्वर ने जीवों के कर्म के अनुसार सृष्टि की रचना करने का जो संकल्प किया उसका नाम कर्म है अर्थात  जैसा कर्म वैसा फल.
अतः  शास्त्र सम्मत अथवा श्रेष्ठ पुरुषों के समान कर्म  करना श्रेष्ठ है. कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है. शुभ कर्म  होंगे तो शुभ फल होगा.
अकर्म
कर्महीनता अकर्म है. कर्महीनता संभव नहीं है और हठ पूर्वक  कर्महीनता मूर्खता है.
विकर्म
निषिद्ध कर्म ही विकर्म है। स्वभाव के विपरीत कर्म भी, विकर्म ही हैं।
अर्जुन श्री कृष्णसे पूछते हैं, यह मनुष्य न चाहता हुआ भी बलपूर्वक लगाए हुए की तरह किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है। साधारण मनुष्य गलत रास्ते पर चले तो समझा जा सकता है परन्तु विद्वान व्यक्ति भी गलत रास्ते पर चले जाते हैं।
श्री भगवान ने सुस्पष्ट किया कि रजोगुण से जन्म लिए काम और क्रोध ही मनुष्य को पाप की ओर ले चलते हैं। यह बहुत खाने वाले हैं और कभी तृप्त नहीं होते हैं। यह बड़े पापी हैं तथा आत्मोन्नति के मार्ग में यह प्रबल शत्रु है
जिस प्रकार धुएं से अग्नि ढकी रहती है तथा दर्पण मैले से ढक जाता है, जेर से गर्भ ढका रहता है उसी प्रकार ज्ञान हमेशा काम-क्रोध से ढका रहता है।
अग्नि के समान सदैव असंतुष्ट यह काम, जो सदा ज्ञानियों का प्रबल शत्रु है उन्हें भटकाता रहता है।
यही भ्रष्टाचार और पाप  का कारण है.
यह काम क्रोध इन्द्रिय मन बुद्धि में सदा बैठे रहते हैं यहाँ बैठकर यह सदैव नित्य शुद्ध ज्ञान को ग्रहण की तरह आच्छादित कर जीवात्मा को मोहित करते हैं। इसलिए मनुष्य न चाहता हुआ भी बलपूर्वक पाप का आचरण करता है।
निष्काम कर्म
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है, अकर्म में कर्म देखता है अर्थात समस्त कर्म करता हुआ साक्षी भाव से तटस्थ रहता है, कर्म तथा उनके फलों में आसक्त नहीं होता है, त्यागते हुए भोगता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और समस्त कर्मों को करने वाला अकर्ता पुरुष है।

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Monday, September 19, 2011

कर्मण्येवाधिकारस्ते - तेरा कर्म में नियन्त्रण हो




कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।47।

कर्म में अधिकार होवे, फल की इच्छा छोड़ दे
कर्म फल का हेतु मत बन, अनासक्त अकर्म में।। 47।।

श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का  श्लोक संख्या  47  का अंश कर्मण्येवाधिकारस्ते देश विदेश में सर्वाधिक प्रचिलित है. हर योगी,भोगी, समाज सुधारक, विद्वान, उद्योगपति, नेता, अभिनेता, टीवी, अखबार  आदि सब  कर्मण्येवाधिकारस्ते  का उपदेश देता है अरे भाई कर्म करो, हम तो कर्म करते हैं, कोई भी कर्म योगी बन जाता है. इस सूत्र का जितना सत्यानाश इस गीता के देश में किया जा रहा है वह शोचनीय है.

कर्मण्येवाधिकारस्ते क्या है?

तेरा कर्म में अधिकार हो - तेरा कर्म में नियन्त्रण हो अर्थात तुम जो भी छोटा बड़ा कर्म करते हो वह जागते हुए करो. दृष्टा भाव से करो. महावीर  स्वामी ने कर्मण्येवाधिकारस्ते के लिए एक बहुत सुन्दर  सूत्र दिया असुत्तो मुनि  जो जागा हुआ है वह मुनि है. वही कर्म योगी है. यही सम्पूर्ण जीवन का रहस्य है. जागते हुए कर्म करना है तभी कर्मों में नियंत्रण हो सकता है. साक्षी भाव से कर्म होने पर स्वतः फल आसक्ति नहीं रहती है.
कर्म फल की इच्छा नहीं होनी है,  यह तभी हो सकता है जब दृष्टा भाव से कर्म किये जायं.  अन्यथा प्रत्येक शुभ अशुभ कर्म में सदा फल की इच्छा  होती है. फल की इच्छा से कर्म और उसके फल में आसक्ति हो जाती है। मन सदैव उस ओर दौड़ता है। आसक्त व्यक्ति का मन में नियन्त्रण नहीं रहता है। कर्म फलका हेतु भी नहीं होना है और कर्म करने में आसक्ति नहीं होनी है।
अतः श्री भगवान कहते हैं हे अर्जुन  तू किसी कर्म करने का  साधन भी मत बन, यह मत सोच तेरे बिना यह कर्म नहीं होगा। कर्म बन्धन के डर से कर्म त्याग दे ऐसा भी नहीं करना है। कर्म अनासक्त होकर, कर्म अपने नियन्त्रण में रखते हुए साक्षी भाव से करने  हैं।

इस बात को अध्याय संख्या 3 में और सुस्पष्ट करते हैं.

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।23

सावधान नहिं कर्मरत, सुना पार्थ चित लाय
बरतेगे तस लोग सब, मार्ग मोर वह जान।। 23।।

यदि मैं सावधानी पूर्वक लोक हित में कार्य न करूं तो लोगों में इस का संदेश गलत जाएगा, क्योंकि मनुष्य मेरे मार्ग का अनुसरण करते हैं। अतः मैं लोक हित में कर्म उसी प्रकार करता हूँ जिस प्रकार सकाम पुरुष कर्म करते हैं।

यहाँ अतन्द्रितः( सावधान) शब्द महत्वपूर्ण है.
कोई भी कर्म जो हो रहा है अथवा जो आप  शुभ अशुभ कर रहे हैं  वह साधरण सकाम कर्म करने वाले की तरह करें  परन्तु  सावधानी पूर्वक करें. यह केवल दृष्टा भाव से ही हो सकता है. इसलिए  अर्जुन को निमित्त मात्र युद्ध करने को कहते हैं.
                      निमित्तमात्र भव सव्यसाचिन

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पूर्ण बोध प्राप्त कर ही इस अश्वत्थ वृक्ष को काटा जा सकता है.


इस अश्वत्थ वृक्ष का स्वरूप संसार में नहीं दिखायी देता क्योंकि इसका न आदि है न अन्त अर्थात कहाँ से प्रारम्भ हुआ । यही नहीं यह वृक्ष अच्छी प्रकार स्थित भी नहीं है, क्योंकि यह नाशवान है। इस वृक्ष की जड़ें बहुत ही गहराई तक गयी हैं। अज्ञान इस वृक्ष की जड़ है, जो इतनी प्रभावशाली है कि उसने अव्यक्त परब्रह्म को भी आच्छादित कर रक्खा है।  ब्रह्म ज्ञान के होने पर ही, यह वृक्ष नष्ट होता है।


               ऊर्ध्वमूल अश्वत्थ योग


अविनाशी अश्वत्थ यह नीचे शाखा ऊपर मूल
छंद इसके पर्ण हैं, जाने विज्ञ विभेद।। 1।।

श्री भगवान अर्जुन को सृष्टि का रहस्य बताते हुए कहते हैं; इस सृष्टि का जो मूल है वह परब्रह्म परमात्मा मूल से भी ऊपर है अर्थात जहाँ से सृष्टि जन्मी है परमात्मा उससे परे है और माया जिसे अज्ञान कहा है इस सृष्टि का मूल है। उस मूल से परे ब्रह्म से यह अश्वत्थ वृक्ष पैदा होता है। माया इस वृक्ष का मूल है, इस वृक्ष का फैलाव ऊपर से नीचे की ओर है। माया (अज्ञान) उस अव्यक्त (ज्ञान) को आच्छादित कर सुला देती है। फिर उस माया में अव्यक्त के बीज से माया का अंकुर फूटता है। परम शुद्ध ज्ञान को अज्ञान (माया) क्रमशः अधिक-अधिक आवृत्त करते जाता है। यही अश्वत्थ वृक्ष की ऊपर से नीचे की ओर फैलने की गति है। यह माया का वृक्ष भी अविनाशी है। वेद (छन्द) इसके पत्ते हैं अर्थात वेद भी माया के पार नहीं जा पाते हैं, अज्ञान से प्रभावित होने के कारण उनकी पहुंच सीमित है। जो मनुष्य इस अश्वत्थ वृक्ष को तत्व से जानता है वही यथार्थ ज्ञानी है.
          

                    अश्वत्थ
       
                                             1-  अव्यक्त
  2-उत्तम पुरुष- परमात्मा –ब्रह्म      .................................................................
                 ज्ञान शक्ति                                                      क्रिया शक्ति

                                                3-अक्षर ब्रह्म 
ब्रह्म की अज्ञानमाय उपाधि (प्रकृति बीज रूप में स्थित ) यहाँ से अश्वत्थ जन्म लेता है.
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4-1 क्षर पुरुष –जीव<<<<<<<<<<>>>>>>>>>>>>> 2 प्रकृति (माया)
( जीव आता जाता, जन्म लेता और मरता दिखाई देता है)  
           ज्ञान शक्ति (क्रियाशील अवस्था ) ................... क्रिया शक्ति      
                      5- माया (अपरा प्रकृति)
             सत्..............रज  ...............  तम

     आकाश          वायु         अग्नि       जल        पृथ्वी
                    6-माया बद्ध जीव
                अहंकार
                     
                 बुद्धि
                   
                   मन
 शब्द.......  स्पर्श... ..       प्रभा      ........ रस   .........गन्ध
    
    आकाश          वायु         अग्नि       जल        पृथ्वी

                                   ज्ञानेन्द्रियां
                                                                               
                   वासना

                  कर्मेन्द्रियां
     
                    विषय
                     
                     चेष्टा
                      
                      कर्म

                संसार-बन्धन
                         1- बंधन से मोक्ष
1-ईश्वर- (उत्तम पुरुष +माया आधीन )- जीव जब क्षर, अक्षर स्थिति को पार कर जाता है , अश्वत्थ वृक्ष का विनाश हो जाता है  ईश्वर प्रगट होता है. अपनी दिव्यताओं के साथ चमकता है.
2-मोक्ष- जीव जब अक्षर ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है.

त्रिगुण विषय कोपल शाखाएं, गहराई सब लोक
कर्म बन्धन की जड़ें, फैली चारों ओर ।। 2।।

इस अश्वत्थ वृक्ष को माया सत्त्व रज तम तीन गुणों से सींचती है। विषय भोग इसके कोपल हैं, चौरासी लाख योनियाँ इसकी शाखाएं हैं, जो ऊपर नीचे सभी जगह फैली हुयी हैं। कर्म बन्धन इस माया रूपी वृक्ष की जड़ हैं, यह जड़ें सभी ओर फैली हुयी हैं। इस अश्वत्थ वृक्ष को हम मानव देह में भी देख सकते हैं। ब्रह्मरंध्र में अव्यक्त परमात्मा का निवास है। इस अश्वत्थ वृक्ष का आज्ञा चक्र से लेकर मूलाधार तक तना है। आज्ञा चक्र से क्रमशः विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार में ज्ञान क्रमशः कम होता जाता है। अनाहत और उसके नीचे चक्रों में तीन गुणों का प्रभाव अधिक और अधिक हो जाता है। यहीं से माया मोह राग द्वेष का जन्म होता है। कर्म में प्रवृत्ति, कर्मफल आसक्ति का फैलाव शरीर में होता जाता है। इसे इस रूप में भी देख सकते हैं ज्ञान, माया (अज्ञान), बुद्धि, मन, शब्द, स्पर्श, प्रभा, रस, गन्ध, ज्ञानेन्द्रियाँ, वासना, कर्मेन्द्रियाँ, विषय, संसार, कर्मफल।

इसका रूप न प्राप्त यहां है, आदि अन्त स्थित नहीं
द्रढ़ मूल के अश्वत्थ को तू,वैराग्य शस्त्र से काट दे।। 3।।

इस अश्वत्थ वृक्ष का स्वरूप संसार में नहीं दिखायी देता क्योंकि इसका न आदि है न अन्त अर्थात कहाँ से प्रारम्भ हुआ, कहाँ इसका अन्त होगा कोई नहीं बता सकता। यही नहीं यह वृक्ष अच्छी प्रकार स्थित भी नहीं है, क्योंकि यह नाशवान है। इस वृक्ष की जड़ें बहुत ही गहराई तक गयी हैं। अज्ञान इस वृक्ष की जड़ है, जो इतनी प्रभावशाली है कि उसने अव्यक्त परब्रह्म को भी आच्छादित कर रक्खा है। इसको काटने का एक ही उपाय है कि वैराग्य रूपी शस्त्र मन में लेकर इस अज्ञान के विशाल अश्वत्थ वृक्ष पर ज्ञान की धार का प्रहार किया जाय। सतत् अभ्यास, वैराग्य द्वारा प्राप्त ब्रह्म ज्ञान के होने पर ही, यह वृक्ष नष्ट होता है।

जहाँ गए नहिं लौटते, भली भांति खोजे परम
जिससे फैली आदि वृत्ति,आदि पुरुष की शरणागती।। 4।।

वैराग्य से इस संसार रूपी वृक्ष को काटकर उस परम पद को भली प्रकार खोजना चाहिए। यह वह स्थिति है जिसे प्राप्त होकर इस वृक्ष के फल उस मनुष्य को ललचा नहीं सकते हैं। संसार चक्र से वे मुक्त हो जाते हैं। उस परब्रह्म परमात्मा से ही यह संसार की प्रवृत्ति का विस्तार हुआ है क्योंकि वह ब्रह्म इसकी उत्पत्ति मूल से ऊपर है, ‘उर्ध्व  मूलहै। ऐसे आदि परम परमात्मा में निरन्तर आत्मरत रहना चाहिए। उस आत्मतत्व में निमग्न पुरुष पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध होकर उसी में स्थित हो जाता है।

रहित मान अरु मोह से, है स्थित अध्यात्म
काम नष्ट सुख-दुःख विमुक्त,नाश रहित पद प्राप्त।। 5।।

जिसका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिस प्रकार प्रकाश होते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है। जिसने आसक्ति रूपी दोष को जीत लिया है अर्थात कमलवत संसार में रहता है, ऐसा विकारहीन पुरुष जो सदा आत्म स्वरूप में स्थित रहता है; ऐसे आत्मरत ब्रह्म ज्ञानी, जिसकी सभी कामनायें नष्ट हो गयी हैं, भुने बीज के समान जिसमें कामना का अंकुर नहीं फूट सकता, सुख-दुःख द्वन्द्वों से मुक्त होकर परम स्थिति अव्यक्तका अधिकारी होता है।

जिसे न भासित सूर्य कर, नहिं पावक नहिं चन्द्र
जहाँ गए नहि लौटते, परम धाम वह मम।। 6।।

मेरे परम स्थान (आत्म स्वरूप) को सूर्य चन्द्रमा और अग्नि प्रकाशित नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह स्थान शाश्वत और परम ज्ञान की स्थिति है। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि अथवा सृष्टि का प्रत्येक परमाणु उसी की सत्ता से संचालित होता है। उसी के कारण सृष्टि प्रकाशित और संचालित है। उस परम स्थान को प्राप्त कर मनुष्य पुनः अज्ञान को प्राप्त नहीं होता जहाँ अज्ञान का कोई अंश भी नहीं है, पूर्ण बोध स्वरूप जो स्थिति है, वह मेरा परम धाम है।

देह सनातन जीव ही जान अंश मम पार्थ
एक्य प्रकृति से होय जब, मन इन्द्रिय स्वीकार।। 7।।

इस देह में अविनाशी जीव मेरा ही अंश है। जब आत्मा इस देह को अपना मान आचरण करने लगता है तो परमतत्व आत्मा जीवत्व धारण कर लेता है। देह के प्रति अहंकार से आत्मा जीवात्मा हो जाती है। आत्मा प्रकृति से एकता पाकर उसके स्वभाव को स्वीकार कर लेती है, फिर मन और पांच इन्द्रियां मेरी हैं यह मानकर कर्म में प्रवृत्त होती हैं, मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ का भाव उदय हो जाता है। फिर वह आत्मा अपना स्वरूप भूल कर जीवात्मा हो जाती है, उसका संग प्रकृति मन और पांच इन्द्रियों से हो जाता है तथा वह देह त्याग करते समय उन मन इन्द्रियों और प्रकृति को आकर्षित करता है।

एक जगह से दूसरी पवन गन्ध उड़ाई
तैसे देही मन सहित अपर देह उड़ जाई।। 8।।

देह त्याग करते समय इस देह का स्वामी जीवात्मा जब देह त्याग कर जाता है तो जिस प्रकार वायु गन्ध को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाती है उसी प्रकार मन सहित इन्द्रियों को ले जाता है। देह त्याग के समय पांच इन्द्रियों की तन्मात्रायें गन्ध, रस, प्रभा, स्पर्श, शब्द; गन्ध-रस में समाहित हो जाती है फिर गन्ध-रस-प्रभा में,इस प्रकार सब शब्द में समाहित हो जाते हैं, शब्द स्वभाव में समाहित जाता है और स्वभाव के साथ जीवात्मा इस देह से अलग हो जाता है फिर जिस शरीर को धारण करता है वहाँ उस पूर्व देह के स्वभाव और शब्द, स्पर्श, प्रभा, रस, गन्ध को लेकर शरीर में स्थित हो जाता है।

ध्राण श्रोत्र रसना त्वचा, लिए चक्षु मन साथ
सब विषयों को भोगता आश्रय कर हे पार्थ ।। 9।।

यह जीवात्मा जहाँ भी जाता है अर्थात जन्म लेता है वहाँ मन और इन्द्रियों का विस्तार कर लेता है। वहाँ वह कान, आंख, त्वचा, रसना घ्राण, और मन के द्वारा विषयों को भोगता है।

स्थित भोगे अरु तजे तीन गुणों से युक्त
मूढ़ न जाने तत्व को ज्ञानवन्त ही जान।। 10।।

अज्ञानी पुरुष इस आत्मा को शरीर छोड़कर जाता हुआ, शरीर में जन्म लेता हुआ और भिन्न भिन्न विषयों को भोगता हुआ देखते हैं वे अविकारी आत्मा को जन्म लेने वाला और मरने वाला, भोगने वाला मानते हैं। जीव बुद्धि से आत्मा में जीव भाव आरोपित करते हैं परन्तु जिन्हें आत्म ज्ञान हो गया है वह आत्मा को अक्रिय मानते हैं चाहे शरीर में कर्ता, भोक्ता, आते जाते दिखायी देती है परन्तु वह सदा नित्य कूटस्थ है, अविकारी है.

जानत हैं इस देहि को, योगी जन उद्योग
अशुचि मूढ़ नहि देहि को, करते भी उद्योग।। 11।।

निरन्तर आत्मचिन्तन में लगे, स्वरूप की खोज में रत योगी इस अव्यक्त अविकारी अकर्ता आत्मा को स्वयं आत्म दर्शन कर तत्व से जानते हैं परन्तु जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है जिसमें देह बुद्धि है, जीव-भाव है, जो मूढ़ हैं, वह यत्न करने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते।

भासित करता जगत को रवि स्थित जो तेज
चन्द्र अग्नि में तेज जो जान उसे मम तेज।। 12।।

सूर्य में जो तेज है, जिस कारण सूर्य लगातार अग्नि और प्रकाश स्वरूप है उसका कारण उसके अन्दर छिपी जीव शक्ति मैं ही हूँ। इसी प्रकार जो तेज चन्द्रमा में अग्नि में या अन्यत्र में है उसके पीछे तू मेरा ही तेज समझ। मेरी जीव शक्ति ही मेरी जड़ प्रकृति को आन्दोलित कर यह सब तेज प्रकट कर रही है।

धारण करता भूत में, भू प्रवेश निज ओज
रस स्वरूप शशि में बसे, सर्व औषधी पुष्ट।। 13।।

पृथ्वी की जो आधार भूत शक्ति है अर्थात जो धारण करने की शक्ति है वह मेरी परा शक्ति के कारण ही है। चन्द्रमा का जो सोम है जिसके कारण पृथ्वी की वनस्पति पुष्ट होती है उन सबके पीछे भी मैं ही छिपा हुआ हूँ अर्थात मेरी परा प्रकृति के कारण अपरा प्रकृति में उसके गुण प्रकट होने लगते हैं।

सब प्राणिन की देह में, वैश्वानर रह पार्थ
आश्रित कर मैं प्राण को, अन्न पचाता चार।। 14।।

मैं सभी प्राणियों के शरीर में वैश्वानर अग्नि के रूप में प्रज्वलित रहता हूँ। यहाँ  प्राण और अपान वायु धौंकनी की तरह इस अग्नि को सुलगाते हैं। मैं इस अग्नि के द्वारा चारों प्रकार के अन्न (कच्चा, पका हुआ, अधपका, द्रव युक्त) को पचाता हूँ अर्थात प्राणियों के शरीर में वैश्वानर अग्नि मेरे कारण ही प्रज्वलित हैं।

सब भूतों के हृदय में अन्तर्यामी पैठ
ज्ञान अपोहन स्मृति मुझसे होते जान
मैं ही वैद्य सभी वेदों का,
वेदान्त वेद का कर्ता ज्ञाता ।। 15।।

मैं समस्त प्राणियों के हृदय में इस विचार का कारण हूँ कि मैं अमुक हूँ। मुझसे स्मृति ज्ञान और अपोहन होता है। स्मृति, का अर्थ है स्मरणशक्ति। यहाँ  यह जानना महत्वपूर्ण है कि जो मनुष्य परमात्मा के जितने नजदीक है उसकी स्मरण शक्ति उतनी अधिक अच्छी होती है। ईश्वर कृपा अथवा उसकी नजदीकी को स्मरण शक्ति (याददाश्त) से जाना जा सकता है। मेरे कारण ही ज्ञान होता है क्योंकि मैं ही परम ज्ञान हूँ। मेरे द्वारा ही मूढ़ता, संशय नष्ट होते हैं। वेदों में जो कुछ जानने योग्य ज्ञान है वह मैं ही हूँ, मैं ही ज्ञान का कर्ता और ज्ञान को जानने वाला हूँ। ज्ञान मेरा ही स्वरूप है।

दो पुरुष इस लोक में, क्षर अक्षर हे पार्थ
सब भूतों का देह क्षर, देही अक्षर जान।। 16।।

इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं एक क्षर अर्थात नाशवान दूसरा अक्षर अविनाशी। इनमें जो भूत हैं जो देह है जो जड़ प्रकृति है वह नाशवान पुरुष है। जो जीव है वह अविनाशी है।

उत्तम पुरुष तो अन्य है, कर प्रवेश त्रय लोक
कर्ता भर्ता अविनाशी वह ईश्वर है परमात्मा।। 17।।

इसमें भी अधिक आश्चर्य की बात यह कि इन क्षर अक्षर दो पुरुषों के अलावा एक तीसरा पुरुष भी है। यह पुरुष अत्यन्त श्रेष्ठ है और जब यह होता है तो दोनों पुरुषों के अस्तित्व को समाप्त कर देता है और सर्वत्र यही उत्तम पुरुष व्याप्त हो जाता है। जब द्रष्टा भाव और दृश्य का लोप हो जाता है तो यह पुरुषोत्तम ही रहता है। यह पुरुषोत्तम तीनों लोकों में अर्थात सृष्टि के कण कण में व्याप्त होकर सृष्टि को धारण किये है। यह उत्तम पुरुष ही परमात्मा अथवा विशुद्ध आत्मा है।

मैं अतीत हूँ क्षेत्र से और जीव से श्रेष्ठ
लोक वेद में इसलिए उत्तम पुरुष प्रसिद्ध।। 18।।

मैं (पुरुषोत्तम) आत्मा क्षर (नाशवान जड़ पदार्थ) जो माया का संसार है, से परे हूँ तथा दूसरे पुरुष जिसे अक्षर अर्थात अविनाशी जीवात्मा जाना जाता है, से भी श्रेष्ठ हूँ इसलिए संसार में और आत्मतत्व को जानने वाले ज्ञान में पुरुषोत्तम के नाम से जाना जाता हूँ।

जो ज्ञानी यह जानता मैं पुरुषोत्तम पार्थ
सर्वज्ञ नर सब भाव से, मुझे भजें दिन-रात।। 19।।

जो ज्ञानी पुरुष क्षर अक्षर को समझते हुए उनसे परे मुझ आत्मतत्व (पुरुषोत्तम) को भली प्रकार जानते है वह यथार्थ को जानने वाला है, सर्वज्ञ है। वह मुझ आत्मा को ही परम गति, परम स्थिति, परब्रह्म परमात्मा जान लेता है, उसकी समस्त साधना, ध्यान योग, सन्यास, यत्न, भक्ति, उपासना आदि सब मेरे लिए होती है। वह आत्म स्थित सदा मुझ परमेश्वर (आत्मतत्व) को ही भजता है अर्थात सदा आत्मरत रहता है।

परम गुह्य इस शास्त्र को कहा तोर हित पार्थ
जो नर जाने तत्व को, विज्ञ कृतार्थ हो जात।। 20।।

हे निष्पाप अर्जुन, मैंने अत्यन्त गोपनीय शास्त्र को तुझे बताया है, यह कोई कल्पना नहीं है, यह यथार्थ है और इसे जानना, समझना और अनुभूत करना हर एक के वश की बात भी नहीं है इसलिए यह गोपनीय है। परन्तु जो मनुष्य इस ज्ञान के तत्व को अर्थात आत्मतत्व को समझ जाता है उसका कल्याण हो जाता है।

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